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बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व- क्षत-विक्षत अवस्था में मिला ‘तेंदुआ शावक’ टाईगर के मिले पगमार्ग

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 4, 2025 6:25 अपराह्न
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मध्य प्रदेश के जंगलों में टाइगर और तेंदुओं की मौत ​का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में रविवार को एक तेंदुआ शावक का शव टुकड़ों में मिला है, हालांकि मौके से शिकार जैसा कोई क्लू नहीं मिला। आसपास तेंदुआ और टाइगर के पगमार्ग जरूर मिले हैं। बाघ-तेंदुओं के लिए सबसे सुरक्षित माने जाने जंगलों और टाइगर रिजर्व इलाकों में पिछले कुछ दिनों से बाघ और तेंदुओं के मरने की खबरें जब-तब सामने आ रही हैं।

dead टाईगर

बीते रविवार को देखा गया शव

रविवार को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में एक तेंदुआ शावक का टुकड़ों में शव मिला है। हालांकि प्रबंधन ने किसी भी तरह की संदिग्ध वस्तु या शिकार से इंकार किया है। आशंका है कि किसी बड़े जानवर ने उसका शिकार कर लिया हो। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से वन्य जीव प्रेमियों के लिए फिर बुरी है। शावक की उम्र करीब 6 माह के आसपास थी। हालांकि शव टुकड़ों में मिला, जिस कारण उसका जेंडर पता नहीं चल पाया है। बता दें कि बीटीआर में बीते महीनो में बाघ और शावकों की मौतों के मामले भी सामने आ चुके हैं।

डॉग स्क्वाड ने की आसपास सर्चिंग

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक डॉक्टर अनुपम सहाय ने बताया कि मानपुर बफर रेंज के मचखेता बीट अंतर्गत कक्ष क्रमांक पीएफ 356 में एक तेंदुआ शावक के शव पड़े होने की सूचना मिली थी। तत्काल रेंजर एवं अन्य स्टॉफ को वहां भेजा गया था। बाद में हम भी वहां पहुंचे और हर जगह डॉग स्क्वाड से निरीक्षण करवाया गया।

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प्राथमिक जांच में बाघ की संलिप्तता पर संदेह गहरा

वन विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार शावक की स्थिति से किसी बड़े मांसाहारी के संघर्ष का अंदाजा लगाया जा रहा है। चूँकि क्षेत्र में बाघों की उपस्थिति अधिक है, इसलिए विभाग को संदेह है कि हमला बाघ द्वारा किया गया होगा। हालांकि, जब तक पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, विभाग किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहता।

क्या यह क्षेत्रीय संघर्ष का मामला है?

बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में पिछले कुछ वर्षों से बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र में बढ़ते बाघों ने अपने क्षेत्र (Territory) का विस्तार कर लिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ सामान्यतः तेंदुए को अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं। चूँकि दोनों प्रजातियाँ मांसाहारी हैं और कई हद तक शिकार के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं, इसलिए क्षेत्रीय संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। यह भी तथ्य महत्वपूर्ण है कि तेंदुए अधिकतर बाघों की उपस्थिति वाले क्षेत्रों में सावधान रहते हैं और सामान्यतः उनसे बचते हैं। मगर तेंदुए का शावक अपेक्षाकृत कमजोर होता है और संघर्ष की स्थिति में उसके पास बचने के लिए पर्याप्त सामर्थ्य या अनुभव नहीं होता। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती बाघ आबादी तेंदुओं को उनके पारंपरिक इलाकों से बाहर खदेड़ रही है, जिसके कारण इनके बीच संघर्ष की घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

स्थानीय अधिकारियों की प्रतिक्रिया

बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के उप निदेशक ने बताया कि घटना की सूचना मिलते ही क्षेत्र से हर बिंदु पर जांच की जा रही है। उन्होंने कहा, “यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हमने सघन निरीक्षण शुरू कर दिया है। मामले की वैज्ञानिक जांच की जाएगी, जिसमें पगमार्गों का विश्लेषण, डीएनए सैंपलिंग और पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट शामिल होगी। वन्यजीवों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।”

स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया

इस घटना के बाद आसपास के गांवों में वन्यजीवों की बढ़ती गतिशीलता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में क्षेत्र में बाघों की आवाजाही में वृद्धि देखी गई है। हालांकि यह क्षेत्र संरक्षित है, लेकिन ग्रामीणों को जंगल से लगे क्षेत्रों में पशुओं के चरने या लकड़ी एकत्र करने के दौरान अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है।एक स्थानीय निवासी ने कहा,“हम प्रकृति से जुड़कर रहने वाले लोग हैं। मगर जब ऐसी घटनाएँ होती हैं तो डर बढ़ जाता है। तेंदुए और बाघ आमतौर पर मनुष्यों से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन सावधानी आवश्यक है।”

संरक्षण के प्रयासों पर सवाल?

बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में बाघ संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहाँ बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण प्रयासों की सफलता का प्रतीक है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बाघों की संख्या बढ़ने से उनका क्षेत्र सीमित हो जाता है और अन्य मांसाहारी प्रजातियों पर दबाव बढ़ता है। इस मामले ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तेंदुओं, हिरणों और अन्य वन्यजीवों के लिए भी पर्याप्त स्थान या संसाधन उपलब्ध हैं? क्या हमें बाघ संरक्षण के साथ-साथ संतुलित पारिस्थितिकी पर भी समान ध्यान नहीं देना चाहिए? वन्यजीव विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि ऐसे संघर्ष प्राकृतिक पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं। जंगल में शिकारी और शिकार का संतुलन स्वयं प्रकृति बनाती है। हस्तक्षेप केवल तभी होना चाहिए जब स्थिति असामान्य या मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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