पश्चिम बंगाल और देश की राजनीति में एक बार फिर अभूतपूर्व हलचल देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख और बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से मुलाकात करने पहुंचीं वहीं ठीक उसी समय कोलकाता के कालीघाट स्थित उनके आवास पर राज्य की ही जांच एजेंसी सीआईडी (CID) की टीम धमक गई।
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) को मजबूत करने की कोशिशों और राज्य स्तर पर आंतरिक बगावत व कानूनी घेरेबंदी के बीच टाइमिंग के इस खेल ने देश के सियासी गलियारों में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला क्या है- दिल्ली में ममता और कोलकाता में सीआईडी?
यह पूरा घटनाक्रम क्रोनोलॉजी और सटीक समय (Timing) के कारण बेहद चर्चा में है। लोकसभा सांसदों की संभावित टूट और आंतरिक सांगठनिक संकट से जूझ रहीं ममता बनर्जी दिल्ली में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास पर महत्वपूर्ण चर्चा के लिए पहुंची थीं।
ठीक इसी दौरान, कोलकाता के कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर (जहां उनके भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी रहते हैं) सीआईडी के आठ अधिकारियों की टीम पहुंच गई। इस टीम में महिला अधिकारी भी शामिल थीं।
सीआईडी की कालीघाट पहुंचने की असली वजह- ‘सिग्नेचर फोर्जरी’ केस
ममता बनर्जी के आवास (कालीघाट) पर सीआईडी के पहुंचने की सीधी वजह अभिषेक बनर्जी को तीसरा नोटिस तामील कराना था। यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा में हुए कथित ‘हस्ताक्षर जालसाजी’ (Signature Forgery Case) से जुड़ा हुआ है।
इस मामले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं
- विवाद की शुरुआत- यह मामला 19 मई को विधानसभा सचिवालय को सौंपे गए एक पत्र से जुड़ा है। इस पत्र में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता (Leader of the Opposition) बनाने का प्रस्ताव था, जिस पर करीब 70 टीएमसी विधायकों के हस्ताक्षर थे।
- बगावती विधायकों की शिकायत- टीएमसी के ही दो बागी विधायकों (ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा) ने स्पीकर से शिकायत की कि इस पत्र में कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर (Blunder/Forged Signatures) किए गए हैं। कुछ हस्ताक्षर ब्लॉक लेटर्स में थे।
- जांच और एफआईआर- विधानसभा के प्रधान सचिव की शुरुआती जांच के बाद हरे स्ट्रीट थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसके बाद जांच राज्य सीआईडी को सौंप दी गई। सीआईडी की पूछताछ में तीन विधायकों ने आधिकारिक तौर पर माना कि पत्र पर उनके हस्ताक्षर नकली हैं।
- अभिषेक बनर्जी की भूमिका- चूंकि अभिषेक बनर्जी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और इस कवरिंग लेटर से जुड़े थे, इसलिए सीआईडी उनसे पूछताछ करना चाहती है।
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कानूनी नोटिस और समय सीमा का टकराव
सीआईडी इससे पहले भी अभिषेक बनर्जी को दो नोटिस जारी कर चुकी थी।
- पहला नोटिस (30 मई)- 1 जून को पेश होने को कहा गया था, लेकिन अभिषेक ने सोनारपुर में खुद पर हुए कथित हमले और अस्वस्थता का हवाला देकर 15 दिन का समय मांगा।
- दूसरा नोटिस (1 जून)- उन्हें 8 जून को पेश होने का निर्देश दिया गया था।
- तीसरा नोटिस (8 जून को तामील)- जब अभिषेक बनर्जी 8 जून को पेश नहीं हुए और उसी समय वह ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक के लिए दिल्ली में थे, तब सीआईडी की टीम वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ उनके कालीघाट आवास पर नोटिस चिपकाने और सौंपने पहुंची। इस नए नोटिस के तहत उन्हें 24 घंटे की सख्त मोहलत देते हुए 9 जून की शाम 5 बजे तक भवानी भवन (सीआईडी मुख्यालय) में पेश होने का आदेश दिया गया।
अभिषेक बनर्जी ने इस समन को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी है और किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण की मांग की है।
टीएमसी के भीतर का आंतरिक संकट- सांसदों की बगावत
ममता बनर्जी का सोनिया गांधी से मिलना केवल ‘इंडिया’ ब्लॉक को मजबूत करने की कवायद नहीं है, बल्कि यह पार्टी को आंतरिक रूप से बिखरने से बचाने की छटपटाहट भी है। बंगाल चुनावों में मिली हार के बाद टीएमसी गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है-
- विधायकों और सांसदों की बगावत- पहले बंगाल में पार्टी के 58 विधायकों ने अलग गुट बनाया। इसके बाद राज्यसभा सांसद सुखेन्दु शेखर रॉय ने इस्तीफा दे दिया।
- लोकसभा में टूट का डर- बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट बनाने की अनुमति मांगी है। हालांकि, ममता गुट के नेताओं (महुआ मोइत्रा, कीर्ति आजाद और कल्याण बनर्जी) का दावा है कि बागी गुट के पास दलबदल कानून से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई (19 सांसद) का आंकड़ा नहीं है।
इस सियासी घटनाक्रम के राजनीतिक मायने
इस पूरी घटना ने देश की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है-
| पक्ष | मुख्य प्रभाव/मायने |
| ममता बनर्जी का रुख | बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी ने खुद को ‘आजाद पंछी’ बताते हुए राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकता को धार देने का फैसला किया है। सोनिया गांधी से मुलाकात इसी कड़ी का हिस्सा है। |
| राज्य बनाम केंद्र की राजनीति | आमतौर पर विपक्षी दल केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं, लेकिन यहाँ दिलचस्प बात यह है कि कार्रवाई राज्य सरकार के अधीन आने वाली सीआईडी कर रही है, जो टीएमसी के अपने ही बागी विधायकों की शिकायत पर आधारित है। |
| पार्टी पर नियंत्रण की जंग | एक तरफ अभिषेक बनर्जी ईडी (प्राइमरी स्कूल भर्ती घोटाला) और सीआईडी (हस्ताक्षर जालसाजी) दोनों के कानूनी रडार पर हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के सांसद और विधायक लगातार बागी रुख अख्तियार कर रहे हैं। |
दिल्ली की बैठकें जहां टीएमसी के राष्ट्रीय वजूद और विपक्षी गठबंधन में उसकी हिस्सेदारी को तय कर रही हैं, वहीं कोलकाता में सीआईडी की यह सक्रियता बताती है कि पार्टी के भीतर कानूनी और सांगठनिक पेंच बहुत बुरी तरह फंस चुका है। आने वाले दिनों में कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख और लोकसभा अध्यक्ष का फैसला पश्चिम बंगाल की इस सियासी पटकथा का अगला अध्याय तय करेगा।







